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वीर कल्लाजी राठौड़ का इतिहास (Veer Kallaji Rathore) व मल्लीनाथ (Mallinath) का इतिहास व उसके महत्वपूर्ण प्रश्न व उनके उत्तर

वीर कल्लाजी राठौड़

  • जन्म - विक्रम संवत् 1601, दुर्गाष्टमी के दिन (1544 ई.)
  • जन्म स्थल- सामियाना मेड़ता (नागौर)
  • पिता - राव अचलाजी
  • दादा - आससिंह
  • गुरु – भैरवनाथ
  • अवतार – शेषनाग का
  • आराध्य देवी – नागणेची माता
  • कल्लाजी, मीराबाई के भतीजे थे।
  • सन् 1567 – 68 में अकबर द्वारा चित्तौड़ आक्रमण के दौरान कल्लाजी ने युद्ध में घायल जयमल को अपने कंधे पर बिठा लिया और दो तलवारें जयमल के हाथों में तथा दो तलवारें स्वयं लेकर युद्ध करने लगे इसी वीरता के कारण उनकी ख्याति चार हाथ (चतुर्भुज देवता), दो सिर वाले देवता के रूप में हुई।
  • मान्यता है कि सिर कटने के बाद भी कल्लाजी का धड़ मुगलों से लड़ता हुआ रूण्डेला तक जा पहुँचा था।
  • कल्लाजी के सिद्ध पीठ को ‘रनेला‘ कहते हैं।
  • चित्तौड़गढ़ किले के भैरवपोल के पास कल्लाजी की छतरी बनी हुई है।
  • नोट - डूँगरपुर जिले के सामलिया क्षेत्र में कल्लाजी की काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है। इस मूर्ति पर प्रतिदिन केसर तथा अफीम चढ़ाई जाती है। 
  • कल्लाजी के थान पर भूत-पिशाच ग्रस्त लोगों व रोगी पशुओं का इलाज होता है।

मल्लीनाथ

  • जन्म - 1358 ई. 
  • पिता - राव सलखा (मारवाड़ के राजा
  • दादा – राव तीड़ा
  • माता - ज्याणी दे
  • गुरु - उगमसी भाटी 
  • रानी रूपादे की  प्रेरणा से मल्लीनाथ जी उगमसी भाटी के शिष्य बने।
  • प्रमुख मंदिर – तिलवाड़ा, बाड़मेर- इनका मंदिर लूणी नदी के तट पर बना हुआ है।
  • मेला - प्रतिवर्ष इनकी याद में चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक तिलवाड़ा (बाड़मेर) में मल्लीनाथ पशु मेला आयोजित होता है।
  • मालाणी परगने का नाम उन्हीं के नाम से जाना जाता है।
  • यहाँ तिलवाड़ा के पास ही मालाजाल गाँव में मल्लीनाथ जी की पत्नी रूपादे का मन्दिर है।
  • चाचा कान्हड़देव की मृत्यु के बाद वे 1374 ई. में महेवा के स्वामी बन गए। राज्य विस्तार के क्रम में 1378 ई. में फिरोज तुगलक के मालवा के सूबेदार निजामुद्दीन की सेना को इन्होंने मार भगाया।
  • अपनी रानी रूपादे की प्रेरणा से वे 1389 ई. में उगमसी भाटी के शिष्य बन गए और योग-साधना की दीक्षा प्राप्त की।
  • मल्लीनाथजी ने मारवाड़ के सारे संतों को एकत्र करके 1399 ई. में वृह्त हरि-कीर्तन आयोजित करवाया। इसी वर्ष चैत्र शुक्ल द्वितीया को इनका स्वर्गवास हो गया।
  • जोधपुर के पश्चिमी परगने का नामकरण इन्हीं के नाम पर ‘मालानी’ किया गया था।
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